रविवार, 8 जून 2014

जाने दे जो चला गया अँधेरा है ।
मत ढूंढ उसमे अब क्या तेरा है ।

ठहरा क्यूँ है साँझ के डर से ,
कदम बढ़ा उस पार सवेरा है ।

क्या है गम जो न पा सका उसे ,
है और इक जहान जहाँ वो तेरा है ।

तू अकेला परेशान नही दुनिया मैं,
हैं सभी जिन्हें आफत ने घेरा है ।

समेत के गम कल का इस्तक़बाल कर ,
जो आग़े है सब कुछ सुनेहरा है । 

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