लोग पास आ-आके दूर जाते रहे ।
बेवज़ह हम खुद को जलाते रहे ।
हाल मेरा वो कभी समझ न सके ,
खामखाँ हम जुबां हिलाते रहे ।
डूबते रहे गम में शामो सहर ,
पैर आंखरी दम तक मगर चलाते रहे ।
गम समेटा है खुद के अंदर बेशक ,
फिर भी जिस से मिले उसे हँसाते रहे ।
बेवज़ह हम खुद को जलाते रहे ।
हाल मेरा वो कभी समझ न सके ,
खामखाँ हम जुबां हिलाते रहे ।
डूबते रहे गम में शामो सहर ,
पैर आंखरी दम तक मगर चलाते रहे ।
गम समेटा है खुद के अंदर बेशक ,
फिर भी जिस से मिले उसे हँसाते रहे ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें