रविवार, 23 जून 2013

परवाज तुम कहो ....

देखो किस कदर इंसान बेचारा है  ,
हाय ये कमबख्त हालात का मारा है ।

जिंदगी इक नदी बहती ही जाती है ,
कौन जनता है किस तरफ़ किनारा है ।

जी रहे सब जब तलक साँस है बाँकी ,
परवाज तुम कहो अब कौन सहारा है ?

शनिवार, 22 जून 2013

मिलते नहीं

मिलते नहीं ख्वाबों के निशाँ देखो ,
बिछड़ जाते हैं जमीन-ओ-असमाँ  देखो ।

न जाने संग तेरे कब तलक है बसर ,
जिंदगी ले जाती है हमें कहाँ देखो । 
मैं खामोश हो जाऊ अब ,
यही बेहतर है हमारे लिए ।
अपने रिश्ते की टूटती दीवार ,
शायद रुक जाये ऐसे ही ।
वरना सारा प्यार तो रिस ही रहा है ,
लम्हा-लम्हा आवाज की दरारों से ।

मुश्किलें जिंदगी में मेरी

मुश्किलें जिंदगी में मेरी कम नही लेकिन ,
जब तक साथ में है तू मुझको डर नही लगता  । 

कब से जी रहा  हूँ मैं तन्हा मकान में ,
सच कहूँ तेरे बिन वो घर, घर नही लगता । 

गौरव उप्रेती ।।